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सत्यमेव जयते

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Govind Bharatvanshi


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जिम्मेदारी !

Posted On: 5 Jan, 2017  
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जय भीम -जय भारत !

Posted On: 31 Dec, 2016  
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जालसाजी !

Posted On: 26 Dec, 2016  
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डाल-पात

Posted On: 22 Dec, 2016  
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यह दौर !

Posted On: 15 Dec, 2016  
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कुछ बातें !

Posted On: 8 Dec, 2016  
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फकीरी !

Posted On: 5 Dec, 2016  
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समय !

Posted On: 2 Dec, 2016  
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पंजाबी पहेली !

Posted On: 29 Nov, 2016  
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आक्रोश !

Posted On: 28 Nov, 2016  
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मान्यवर हर अच्छाई में कुछ न कुछ बुराई होती है, और हर बुराई में कुछ न कुछ अच्छाई होती है। वर्तमान परिवेश में राजनीति सबसे गन्दा क्षेत्र है तो क्या हमें राजनीति का परित्याग कर देना चाहिये, कदापि नहीं, अपितु उसमें सुधार करना चाहिये। यह कहना भी उचित एवं न्याय संगत नहीं कि एनजीओ केवल भ्रष्टाचार करने का माध्यम हैं। खास तौर पर किरण बेदी और केजरीवाल के बारे तो हम ऐसा नहीं सोच सकते है।    आदरणीय मान्यवर क्या अन्ना टीम की तरह आप भी परिवर्तन की बारें में नहीं सोचते। यदि हम सोचने के पहले ही हार मान जायेंगे, तो फिर करने का तो कोई औचित्य नहीं है।       आदरणीय रामदेव जी एक आयुर्वेदिक वैद्य से व्यापारी, व्यापारी से संत एवं संत से राजनेता, जबकि अन्ना एक आम आदमी से सैनिक, एक सैनिक से समाज सेवी और एक समाज सेवी से संत, फिर क्यों  न अन्ना टीम पर विश्वास किया जाय।     भूषण पिता पुत्र प्रख्यात वकील हैं, वकालत का व्यवसाय अधिकांशतः अपराधियों पर आश्रित है, सामान्यतः राजनेता अपराधिक पृष्टभुमि से जुड़े होते हैं। अमरसिंह जी का भेद जब तक खुला नहीं था, वह एक सम्मानित राजनेता माने जाते थे.....ऐसे में भूषण पिता-पुत्र जोड़ी को दोषी मान लेना उचित  नहीं है। हो सकता है यह मेरा अल्पज्ञान हो।    अन्ना टीम एवं आदरणीय रामदेव जी की कार्यशैली में अन्तर है, संभवतः विचार धारायें भी प्रथक हैं। किन्तु उद्देश्य एक है, अतः उद्देश्य एक होने के कारण इनका एक होना अनुचित नहीं है। दुर्भाग्य से दोंनो ही अपनी अज्ञात महत्वकांक्षा के कारण एक दूसरे को अपने से आगे नहीं होने देना चाहते। अतः पहले अन्ना टीम रामदेव जी को अपने से प्रथक और अब रामदेव जी अन्ना टीम को अपने से प्रथक रखना चाहते हैं। इसलिये ही दोंनो अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पा रहे हैं। संभवतः दोनों की सलाहकार सीमित सोच रखती है, देश हित की नहीं, अपितु अपने भविष्य की सोच रहे हैं।   मैं इसे न तो एक दूसरे के अपमान की श्रेणी में रखता हूँ, और न ही अवसरवादिता की श्रेणी में रखता हूँ। यह तो एक मात्र वैचारिक मतभेद है, जिसे देश हित के लिये दोनों का दूर करना चाहिये।     यह दोंनो प्रथक- प्रथक स्वयं के लिये समस्या हैं, किन्तु एक होने पर देश की समस्याओं का समाधान हैं। हाँ एक बात और आन्दोलन की सफलता के लिये आवश्यक है कि उसमें सभी वर्ग, सम्प्रदाय एवं जाति के लोग जुड़े। संभवतः बुखारी जी से अन्ना टीम का मिलना इसी परिपेक्ष में हैं। आन्दोलन की सफलता के लिये यह आवश्यक भी है।     नेता सुभाष चन्द्र की आजाद हिन्द भोज से मुसलमान एवं ईसाई नहीं जुड़़ पाये थे। जिस कारण से उन्हें उम्मीद के अनुसार सफलता नहीं मिल पाई थी।

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