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सत्यमेव जयते

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सफर के सपने !

Posted On: 28 Oct, 2012 में

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सपने देखे चलते चलते

देखा उनको धुंधले होते

गहन कुहासे निशा के तम में

सपने ज्योति जगाते मन में

लौट के देखा पथिक ने पीछे

कहाँ गया विश्वास जो सींचे

कभी अकेले जीत का दम था

फिसलन से आज क्यों डर था

तप्त लहू , उन्मादी भक्ति

अपनी सोच ही अपनी शक्ति

भगवन बैठे राह दिखाएँ

आँख बंद कर देख न पायें

खोलो आँख प्रभु अब जागो

लक्ष्य भेदने जोर से भागो

नहीं रोक पायेगा कोई

साथी है दुनिया ये सोयी

सफर का सपना पूरा होगा

गहन श्वास ले चलना होगा

ठहर के दो पल शक्ति जोड़ो

धारा अब इतिहास की मोड़ो.वन्देमातरम !

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santlal Karun के द्वारा
October 28, 2012

अच्छी तुकांत कविता, प्रभावी; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! “तप्त लहू , उन्मादी भक्ति अपनी सोच ही अपनी शक्ति भगवन बैठे राह दिखाएँ आँख बंद कर देख न पायें खोलो आँख प्रभु अब जागो लक्ष्य भेदने जोर से भागो नहीं रोक पायेगा कोई साथी है दुनिया ये सोयी सफर का सपना पूरा होगा गहन श्वास ले चलना होगा ठहर के दो पल शक्ति जोड़ो धारा अब इतिहास की मोड़ो”

    Govind Bharatvanshi के द्वारा
    November 1, 2012

    श्रद्धेय ,सादर प्रणाम धारा अब इतिहास की मोड़ो….सादर आभार वन्देमातरम

pritish1 के द्वारा
October 28, 2012

वन्देमातरम !………..जो शत्रु का कलेजा चीरे, धार अभी वो बाकि है। मस्तक काटे जो शत्रु का, तलवार अभी वो बाकि है। कायरता ना समझे गिदड, हम शेरो कि खामोशी को…. क्युकी… जो शत्रुका सीना चीरे, कटार अभी वो बाकि है…॥…..मेरे ब्लॉग मैं आयें……भारत का स्वर्णिम अतीत

    Govind Bharatvanshi के द्वारा
    November 1, 2012

    कायरता ना समझे गिदड, हम शेरो कि खामोशी को…. क्युकी… जो शत्रुका सीना चीरे, कटार अभी वो बाकि है…॥………….बहुत आभार वन्देमातरम


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