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सत्यमेव जयते

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कुछ यादें !

Posted On: 20 Mar, 2012 Others में

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आदरणीय मित्रों ,.सादर अभिवादन ..हम कभी कभी जीवन में पीछे मुड़कर देखते हैं तो चेहरे पर मुस्कान आ जाती है ,.अपने जीवन के ऐसे हे कुछ प्रसंग आपके साथ साझा करता हूँ .

सटीक अनुमान - बात करीब बाईस-तेईस साल पहले की है जब मैं दस ग्यारह सालों का था ,..चौपाल के छप्पर के बीच  लगाने के लिए एक बडेर (लंबी लकड़ी ) की जरूरत थी ,उसके लिए मेरे बाबा जी ने बगल के गाँव से एक यूकेलिप्टस का पेड़ खरीदा ,हम तीन लोग मैं ,बाबाजी और एक मजदूर प्यारेलाल तीनों बैलगाडी से उसे काटकर लाने पहुंचे ,बाबा ने हमको काटने के कामपर लगाकर गांव से रस्सी और कुछ आदमी लाने चले गए ताकि उसे निश्चित दिशा में गिराया और बैलगाड़ी पर लदवाया जा सके ,वो हमें यह बताना भूल गए कि पूरा नहीं काटना है,जबतक वो वापस आये तबतक प्यारेलाल ने पेड़ को लगभग काट दिया , पेड़ गिरने के लिए विपरीत दिशा में झुकने लगा जहाँ बगल के खेत का काफी नुक्सान हो सकता था ,बाबा पहले तो गुस्सा हुए फिर तुरंत मुझे पेड़ पर चढ़कर करीब अट्ठारह बीस फुट ऊपर टहनी के पास रस्सी बाँधने का आदेश दिया ,मैंने हिचकिचाकर उनकी तरफ देखा उनकी आँखों में विश्वास देख मैं रस्सी ले लपककर चढ़ने लगा और चंद पलों में ही रस्सी नियत स्थान पर बाँध दी ,मेरे भार से पेड़ और तेजी से नीचे जाने लगा लेकिन तबतक काम हो गया और सबने मिलकर रस्सी खींच ली मैं सुरक्षित उतर आया और पेड़ को मनचाही स्थिति में गिराने में सफल हुए !….बाबा अब नहीं हैं ,अभी भी प्यारेलाल मिलता है तो वो वाकया याद करके हँसता है और मेरी हिम्मत की तारीफ करता है , मैं उसे कहता हूँ कि मेरी हिम्मत से ज्यादा बाबा का सटीक अनुमान कारगर था कि रस्सी बांधनी कहाँ है !!

किनारा मिला - मैं आठवीं में पढता था तो एक छोटी नदी को नाव से पार कर स्कूल जाता था ,.एक दिन नाविक नाव को बांधकर कहीं चला गया ,.उनके रहते मैं कभी कभी नाव चला लेता था तो अकेले ही नाव खोलकर चल पड़ा उसदिन धारा तेज थी बीच में नाव घूम गयी बहुत प्रयासों के बाद भी सँभालने में असमर्थ हो गया और थककर धारा के साथ बहने लगा ,.तबतक नाविक आ गया और किनारे चलते हुए मुझे बताने लगा कि क्या करूं ,.करीब एक किलोमीटर के बाद मुझे किनारा मिल गया , आज वहाँ पुल बन गया है ,.वो नाविक अभी भी मिलते हैं और याद करने पर हँसते हैं .

जब ईश्वर देखा - डेढ़ साल पहले शताब्दी गाड़ी से अपने घर आ रहा था ,.रास्ते में खाना आया ,..खाने की बिलकुल इच्छा नहीं होने पर परिचारकों को मना कर दिया ,.फिर देखा कि कुछ लोग पैक करवा रहे हैं तो मन में विचार आया कि क्यों न मैं भी पैक करवा लूं ,.घर में कोई नही खायेगा लेकिन स्टेशन पर किसी जरूरतमंद को दे दूंगा ,.परिचारक ने दस रुपये लेकर खाना पैक कर दिया ,.स्टेशन पर जैसे ही पुल से उतरा एक कृशकाय वृद्ध सीढ़ियो के पास बैठे थे ,.मैंने उनसे पुछा कि खाना खाओगे उन्होंने शून्य में देखते हुए कोई जबाब नही दिया ,.फिर मैंने उनको हिलाकर पुछा तो उन्होंने हाथ के इशारे से बताया कि सुनाई नही पड़ता है, बोल भी नही पाते हैं ,दिखता भी नही है ,मैंने खाने का लिफाफा उनके हाथों में रख दिया,उसको महसूस करते हुए जो खुशी उनके चेहरे पर दिखी वो अवर्णनीय है ,..घर आकार यह वाकया माँ को बताया तो उन्होंने कहा कि वो ईश्वर ही थे .

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rahulpriyadarshi के द्वारा
March 22, 2012

आपने अपनी जिंदगी के अनुभवों को याद रखते हुए उनसे जो सीख ली है,वह निश्चय ही आपके भावी जिंदगी में बहुत ही सहायक सिद्ध होगी,अपने अनुभव मंच पर साझा करने के लिए धन्यवाद :)

    Govind Bharatvanshi के द्वारा
    March 28, 2012

    राहुल जी ,पोस्ट पढ़ने और अपनी सकारात्मक प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक आभार आपका ,.जब भावनाये उफान मारती हैं तो कभी अनुभव भूल जाते हैं , लेकिन अंततः उनके सहारे ही आगे बढ़ना होता है ,.सादर आभार


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